दान लीला ( प्रसंग प्रकार ) : रचना सूची
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गढतें ग्वालिनि उतरी, शीश महीकौ माँट।।
आडौ कन्हैया व्है रह्यौ रोकी, व्रजबधू बाट ।। नागरि दान दै।।
कहाँकी हौ तुम ग्वालिनी, कहा तिहारौ नाम ।।
बरसानेकी ग्वालिनी प्यारी, राधा मेरौ नाम।। मोहन जान दै।।
वृंदावनकी कुँजमे, अचरा पकर्यौ दौर।।
नाम दानकौ लेत लेत हौ,लाला, चाहत हौ कछु और,मोहन जान दै।।
तुम अकेले हम अकेली, बात नहीं कछु जोग।।
तुम तौ चतुर प्रवीन हौ, कहा कहेंगे लोग।। मोहन जान दे।।
संगकी सखु सब दूरि निकसि, हम रोकी बनमांझ।।
घर तौ दारुन सास है, अब होन लगी है साझ ।। मोहन जान दे।।
तुम ओढी है कामरी, हम पेहेर्यौ है चीर ।।
उमढि घुमढि आई बादरी, अब कहा बरसावत नीर। मोहन जान दे।।
प्रेम मगन ग्वालिन भई, हरि को दरशन पाय ।।
मुख तें बचन न आवही, सो लगी ठगौरी जाय ।। मोहन जान दे।।
लै मटुकी आगें धरी, परी स्यामके पांय।।
मन भावै सो लीजिये, बचै सो बेचन जांय।। मोहन जान दे।।
सुख बाढ्यौ आनंद भयौ, रही स्याम गुन गाय ।।
सुंदर शोभा देखिकें, सूरदास बलि जाय ।। मोहन जान दे।।

पद अज्ञात 11/10/2023

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पद सूरदास 11/10/2023

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तब हंसि बोलीं ग्वालि, नाम जब कान्ह सुनायौ।
चोरी भरयौ न पेट, आनि अब दान लगायौ।।
तब उलटी पलटी फबी, जब सिसु रहे कन्हाइ।
अब कछु उहिं धोखैं करौ तौ छिनक माहिं पति जाइ।।
तब उठि बोले कान्ह, रहीं तुम पोच सदाई।
महर-महरि-मुख पाइ, संक तजि करहु ढिठाई।।
अब वह धोखौ मेटि कै, छांड़ि देहु अभिमान।
करि लेखौ अब दान कौ, दियैं पाइ हौ जान।।
तब हँसि बोलीं ग्वालि, डरनि तुम तजो ढिठाई।
बहुतै नंद निकाज, भयौ तुव तप-अधिकाई।।
काल्हिहिं घर-घर डोलते, खाते दही चुराइ।
राति कछु सपनौ भयौ, प्रात भई ठकुराइ।।
भली कही नहिं ग्वारि, बात कौ भेद न पायौ।
पिता-रचित धन धाम, पुत्र के काजहि आयौ।।
तुमसे प्रजा बसाइ कै, राखे हैं इहिं ठाइ।
ते तुम हम सरबस भई अब मिलहु छाँड़ि चतुराइ।।

पद अज्ञात 11/10/2023