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Shrihit
पग धीरे कैसे दूलहा धरत है सखी

पग धीरे कैसे दूलहा धरत है सखी
चले धीरे जैसे कोल्हू के बरद हे सखी।।
ऐसी उपमा में कवन विवेक हे सखी ।
वर औ वरद के नाम गुण एक है सखी  ।।
अहै वरद वही जो वर -दानी हे सखी ।
लेकिन कोल्हू के बरद क्यों प्रमानी हे सखी ।।
पेरे बरद कोल्हू में सरसों घानी हे सखी ।
ये चौरासी लाख जोनी के विधानी हे सखी ।।
डग लम्बी अब चाल कैसी लागे हे सखी ।
जैसे बंधन से छूटि अज भागे हे सखी ।।
अज तो बकरा के लोग कहें हे सखी ।
अज ये हू ,अज राजा इनके रहे हे सखी ।।
कैसे लागे अब अंगना में ठाढे हे सखी ।
ज्यों सुवर्ण नील मणि खम्भ गाड़े हे सखी ।।
खम्भ जड़ किन्तु दूलहा तो चैतन्य हे सखी ।
जड़ चेतन में राम ,नहीं अन्य हे सखी ।।
इनकी उंगली के इशारे जग नाचे हे सखी ।
तब आप बिनु नाचे कैसे बाँचे हे सखी ।।
दूलहा मुसकत मुख दे रुमाल हे सखी ।
झांकी देखिके 'नारायण'निहाल हे सखी ।।

( सृजन तिथि : Jun 12, 2024 , रचना प्रकार - भजन , रचनाकार - नारायण दास )
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Shrihit
ब्रज रज की महिमा

ब्रज रज की महिमा अमर, ब्रज रस की है खान,
ब्रज रज माथे पर चढ़े, ब्रज है स्वर्ग समान।

भोली-भाली राधिका, भोले कृष्ण कुमार,
कुंज गलिन खेलत फिरें, ब्रज रज चरण पखार।

ब्रज की रज चंदन बनी, माटी बनी अबीर,
कृष्ण प्रेम रंग घोल के, लिपटे सब ब्रज वीर।

ब्रज की रज भक्ति बनी, ब्रज है कान्हा रूप,
कण-कण में माधव बसे, कृष्ण समान स्वरूप।

राधा ऐसी बावरी, कृष्ण चरण की आस,
छलिया मन ही ले गयो, अब किस पर विश्वास।

ब्रज की रज मखमल बनी, कृष्ण भक्ति का राग,
गिरिराज की परिक्रमा, कृष्ण चरण अनुराग।

वंशीवट यमुना बहे, राधा संग ब्रजधाम,
कृष्ण नाम की लहरियां, निकले आठों याम।

गोकुल की गलियां भलीं, कृष्ण चरणों की थाप,
अपने माथे पर लगा, धन्य भाग भईं आप।

ब्रज की रज माथे लगा, रटे कन्हाई नाम,
जब शरीर प्राणन तजे मिले, कृष्ण का धाम।

( सृजन तिथि : Jun 12, 2024 , रचना प्रकार - अन्य , रचनाकार - रसखान )
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पग धीरे कैसे दूलहा धरत है सखी

पग धीरे कैसे दूलहा धरत है सखी
चले धीरे जैसे कोल्हू के बरद हे सखी।।
ऐसी उपमा में कवन विवेक हे सखी ।
वर औ वरद के नाम गुण एक है सखी  ।।
अहै वरद वही जो वर -दानी हे सखी ।
लेकिन कोल्हू के बरद क्यों प्रमानी हे सखी ।।
पेरे बरद कोल्हू में सरसों घानी हे सखी ।
ये चौरासी लाख जोनी के विधानी हे सखी ।।
डग लम्बी अब चाल कैसी लागे हे सखी ।
जैसे बंधन से छूटि अज भागे हे सखी ।।
अज तो बकरा के लोग कहें हे सखी ।
अज ये हू ,अज राजा इनके रहे हे सखी ।।
कैसे लागे अब अंगना में ठाढे हे सखी ।
ज्यों सुवर्ण नील मणि खम्भ गाड़े हे सखी ।।
खम्भ जड़ किन्तु दूलहा तो चैतन्य हे सखी ।
जड़ चेतन में राम ,नहीं अन्य हे सखी ।।
इनकी उंगली के इशारे जग नाचे हे सखी ।
तब आप बिनु नाचे कैसे बाँचे हे सखी ।।
दूलहा मुसकत मुख दे रुमाल हे सखी ।
झांकी देखिके 'नारायण'निहाल हे सखी ।।

( सृजन तिथि : Jun 12, 2024 , रचना प्रकार - भजन , रचनाकार - नारायण दास )
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ब्रज रज की महिमा

ब्रज रज की महिमा अमर, ब्रज रस की है खान,
ब्रज रज माथे पर चढ़े, ब्रज है स्वर्ग समान।

भोली-भाली राधिका, भोले कृष्ण कुमार,
कुंज गलिन खेलत फिरें, ब्रज रज चरण पखार।

ब्रज की रज चंदन बनी, माटी बनी अबीर,
कृष्ण प्रेम रंग घोल के, लिपटे सब ब्रज वीर।

ब्रज की रज भक्ति बनी, ब्रज है कान्हा रूप,
कण-कण में माधव बसे, कृष्ण समान स्वरूप।

राधा ऐसी बावरी, कृष्ण चरण की आस,
छलिया मन ही ले गयो, अब किस पर विश्वास।

ब्रज की रज मखमल बनी, कृष्ण भक्ति का राग,
गिरिराज की परिक्रमा, कृष्ण चरण अनुराग।

वंशीवट यमुना बहे, राधा संग ब्रजधाम,
कृष्ण नाम की लहरियां, निकले आठों याम।

गोकुल की गलियां भलीं, कृष्ण चरणों की थाप,
अपने माथे पर लगा, धन्य भाग भईं आप।

ब्रज की रज माथे लगा, रटे कन्हाई नाम,
जब शरीर प्राणन तजे मिले, कृष्ण का धाम।

( सृजन तिथि : Jun 12, 2024 , रचना प्रकार - अन्य , रचनाकार - रसखान )
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