रचनाकार/कवि/भक्त: नागरीदास ( सम्प्रदाय - NA )
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नाचत रंग भरे रावल आये। 
जसुमति नन्द सहित सब गोकुल सौंजन सकट भराये॥१॥ 
तोरन कलश जलज मणि झालर धुजा पताकन द्वार बनाये। 
चंदन गलीं नगर की छिरकीं अजिरन बरन वितान तनाये॥२॥ 
जित कित श्रवन सुजस धुनि सुनियत जनम नक्षत्र विमल गुन गाये। 
सुभ सुकुमारी प्यारी प्रगटी धन्य हिता जिन संच हिताये॥३॥
श्रीबृषभान नृपति जू के घर पूरित मंगल विविध बधाये।
यह सुख सपने हूँ नहिं भैया हो कहा भयौ बेटा हू जाये। 
धन्य कूख कीरतिदा रानी बल्लव कुल के तिमिर नसाये।
सुन्दरि सकल घोष परकासक अतुलित आनन्द नैन सिराये॥
सोभा निधि उर धरी सिरोमनि ब्रज-वन दिन-दिन कौतिक छाये। 
रूप अवधि है सुता छबीली सुकृत पुंज बड़भागन पाये॥६॥ 
कुमकुम चोबा भर नर नारी दूध दही के माँट लुढाये। 
नित्र्तत बाहु परस्पर कंधन अब कल कारज मन के भाये॥७॥ 
हँसत लसत लटकत रस भीजे कोलाहल वर भवन बढ़ाये। 
प्रेम मगन पट भूषन छूटत ओकश् ओक ओघ गोरसन बहाये॥८॥ 
व्योम विमान अमर गन देखत सकल समूह कुसुम बरसाये। 
जय धुनि कह धनि मानि अपनपो हरषि-हरषि नीसान बजाये॥९॥ 
अति उदार राजन के राजा मानिक मणिनु सकल अघवाये।
निपट निसंक दान नहिं उसरतु हाटक हीर चीर बगराये’॥१०॥ 
भान नरिंद्र कुटुम्ब कौ मंडन सुहृदन पट भूषन पहिरायें। 
नागरीदास धनिक भये जाचक गोधन भवन भंडार लुटाये॥११॥

पद नागरीदास 20/09/2023

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बिहारिन लाडिली सुख रासि ।
रूप अनूप महा मन मोहनी सहज छबीली हासि ॥
अंग अंग अनंग रंग स्याम संग विलसत मननि हुलासि ।
इहि रस मत्त मगन अनुदिन बलि जाइ नागरीदासि ॥ 

हमारी लाड़िली नित्य विहारिनी [श्री राधा] सुख की राशि हैं । जिनका स्वरूप अति अद्बुत एवं अनूप है, मन को मोहने वाली एवं जिनकी छबीली मृदु हास [मुस्कान] है ।

श्री राधा के अंग अंग प्रेम रूपी अनंग से रंगे हुए हैं, जो नित्य ही श्याम सुंदर संग विहार पारायण है एवं नित्य ही उल्लसित रहती हैं । श्री नागरीदेव जी कहते हैं कि वे भी अनुदिन श्री राधा को निहार निहार कर, नित्य विहार के इस अद्बुत रस में उन्मत्त रहते हैं और पुनः पुनः बलिहारी जाते हैं ।

पद नागरीदास 14/03/2023

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