श्री ललिता गनगौर हमारी ।
श्री कुँजबिहारिन की सुखकारिन ,लाड़ लाड़वत  ज्यौं प्रिया भावत , पूँछि पूँछि तिन  कुँजबिहारी ।१।
संपति संग वृंदावन राजत  , दंपति रुख सुख सेवा साजत , नेहभरीं सबहींन संचारी ।
प्रेम प्रकासिनि श्री हरिदासिनि , रसिकन की रस तृषा नसावनि , राखत अटल सुहाग संभारी ।२।
सब गुन आगर  चिर रस सागर  , सोई निधिवन नागरि नागर , प्रीति प्रतीति रसरीत उजारी ।
श्रीराधा चरण दासि निज जीवन , सेवौं कृष्णचन्द्र प्रिया पति धन ,  राखी हौं सरन जाऊँ बलिहारी ।३।