बृज में होरी को आनंद ।
यह आनंद रस चाखन प्रकट्यो, बृजहि सच्चिदानंद ।।
ज्योती रूप रह्यो वह जौलौं, जरत रह्यो निज अंग ।
जौलौं अयन नार पहि कीन्हों, पायो विषधर संग ।।
कमठ मीन वाराह बिकट वपु, केतिक जीवन धारे ।
लखि ना पर्यो रस बिंदु प्रेम को, रहे सिंधु ज्यों खारे ।।
श्रीराधा रससार नारि जब, तिरछी चितवन देख्यो ।
नीरस निर्गुण ब्रह्म ईश तब, प्रेम रंग रस पेख्यो ।।
सोई जुगल प्रेम आनंद रस, बरषत बृज चहुँ ओरी ।
'मदनगोपाल' के हिरदय खेलत, प्रियालाल रंग होरी ।।