बड़ो पर्व त्यौहार दिवारी।
विविध शृंगार कियो लरिकन को, रोरी तिलक सोहत भारी।।
कंचन थाल साज ब्रज बनीता, नंदराय घर आयी।
पुलके दिप समीप सोंज भर , गावत गीत सुहाई ।।
श्रीविट्ठल गिरिधरन लाल छबि संग, अंग अधिकाई।
यह शोभा कछु कहीन परत है, देखत रही मुसकाई।।