दान दै री नवल किसोरी |
माँगत लाल लाड़िलौ नागर, प्रगट भई दिन दिन की चोरी ||
नव नारंग कनक हीरावलि, विद्रुम सरस जलज मनि गोरी |
पूरित रस पीयूष जुगल घट, कमल कदलि खंजन की जोरी ||
तोपैं सकल सौंज दामिनि की, कत सतराति कुटिल दृग भोरी |
नूपुर रव किंकिनी पिसुन घर, ‘हित हरिवंश’ कहत नहिं थोरी ||51||