वृषभानुलली जमनोत्सव ( प्रसंग प्रकार ) : रचना सूची
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सबको बहुत बहुत मंगल बधाई हो बधाई हो ॥
कुँवरि  जनमत ही ब्रज-जन फूले तन-मन माई। 
श्री बरसाने गोपराज घर बाजत सुनि है बधाई।।टेक।। 
रानी जग जानी श्री कीरति भाग भरी छबि छाई। 
रूप प्रेम रस अबधि मुख सुखनिधि कन्या जाई।। 
सदन-सदन आनँद महा मंगल शोभा कही न जाई। 
नर नारी हरषे सब ऐसें मनौं रंग निधि पाई।।1।। 
बनि-बनि बनिता भवन-भवन तें चलीं जुरि छबि सौं राजैं 
वदन चन्द आंनन्द भरे मानोैं हाथन थार विराजेैं।। 
सौरभ जल सींची बीथी महमहात मन मोहैं।
चंचल गति दामिनी सी भामिनि गावत गीतन सोहैं।।2।। 
आईं श्रीवृषभान भवन जहाँ ऊँचे अटा-अटारी। 
कनक कलश पर धुजा पताका जगमगात छबि न्यारी।। 
बाजत द्वारें ताल पखावत गोमुख दुन्दुभि भेरी। 
गोप कुमार मैन से डोलत बोलत देै-देै हेरी।। 3।। 
कंचन धरनी मणिमय आँगन रँग भरी नारी नाचैं। 
हरषेैं बरषे दधि घृत हरदी छिरकत काहू न बाचेैं।। 
इक गहि चौबा चंदन छिरकेैं इक पय भाजन ढारेैं। 
एक परस्पर माखन लै-लै तकि-तकि हँसि-हँसि मारैं।। 4।। 
इक गावैं एक जंत्र बजावैं इक लै भेटन आवैं। 
इक निकसेैं एक पैठेैं मंदिर निरखि लली सुख पावैं। 
इक कीरति के चरणन गहि-गहि धनि-धनि वचन उचारेैं। 
एक कुंवरि कौ रूप विलोकत तन-मन धन कौं वारेैं।। 5।। 
एक रहीं इकटक लखि शोभा इक तन फूली डोलेैं। 
इक दिखि आवैं आँगन छबि सौं जै-जै बानी बोलेैं।। 
इक पुनि लै-लै मन्दिर में तें गोरस घट ढरकावेैं। 
बहे पनारे न्यारे-न्यारे वीथिन कीच मचावैं।।6।। 
कनक भीत विद्रुम मणि देहरि नग खचे खंभ विराजैं 
लटकत तोरन रतन जगमगैं हाटक फाटक राजैं।।
कहा कहौं सुन्दर मंदिर की सोभा कहत न आवै।
दमकत बनितत के तन चंचल प्रतिविंबित दरसावैं।। 7।।
चारु चँदोवा मुक्ता झालर घर-घर आँगन सोहैं। 
झलमलाइ रही चहुँ दिसि सोभा जो मोहैं। 
को कवि बरनैं महा महोत्सव सुर तिय हिय सरसाने। 
निर्त्तत गावत कुसुमन बरषत सुन्दर श्री बरषने।। 8।। 
बाबा नन्द रु महरि जसोद सुनि-सुनि अति हरषाहीं। 
नन्दलला आनन्द भयौ मन फूले मन हीं माहीं।। 
द्विज मागत बंदीजन फूले जै-जै बानी राजैं। 
गोप सभा के मध्य नृपति मणि श्रीवृषभान विराजैं।।9।। 
जहाँ तहाँ जाकी चलत सुधा-सी निर्मल सुजस कहानी। 
इन्द्र समान सबन पर वरषेैं मुदित बड़ दानी।। 
विप्रन धेनु दई बहु विधि सौं कनक सींग खुर रूपे। 
निरधन धनी किये धन देै-देै देत विचार न भूपेै।।10।। 
भ्राता बन्धु सबै पहिराये देै केसर के टीके। 
भये बिदा सुख भीजे तन मन चलत बिराजत नीके।। 
दान मान सबहिनु कौं दीनोैं जुवती जन पहिराई। 
मुक्तामणि मय कंचन भूषन सारी सुरंग सुहाई।। 11।। 
सब काहू कौं मोद बढ्योै अति भयौ जु मन कौ भायोै। 
पुर-पुर घर-घर नर नारिनु मिलि लोक-लोक जस गायोै।। 
श्रीराधा रसिकन की जीवन प्रगटी सब सुखदाई। 
दामोदर हित श्रीवृन्दावन वास बधाई  पाई।।11।।

अन्य अज्ञात 07/09/2023

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राधा रानी को भयो अवतार, 
बधाई बाज रही,
ऐ जी हाँ बधाई बाज रही,
ऐ री हाँ बधाई बाज रही,
चलो रे चलो रे भानु के द्वार,
बधाई बाज रही ॥

बरसाने में बजत बधाई,
प्रकटी श्री श्यामा सुखदाई,
आई रसिकन की प्राणाधार,
बधाई बाज रही,
राधे रानी को भयो अवतार ॥

लूट रहे हीरे मोतिन माला,
आज मिलेंगे शाल दुशाला,
सखी गाई रही मंगलाचार,
बधाई बाज रही,
राधा रानी को भयो अवतार ॥

जुग जुग जियो राधा प्यारी,
जय जय भानुकुल उजियारी,
छाई ब्रज खुशी अपार,
बधाई बाज रही,
राधे रानी को भयो अवतार ॥

चित्र विचित्र जब सुनी रे खबरिया,
आये पकड़ पागल की उंगलिया,
राधा रानी पे जाये बलिहार,
बधाई बाज रही,
राधे रानी को भयो अवतार ॥

राधा रानी को भयो अवतार,
बधाई बाज रही,
ऐ जी हाँ बधाई बाज रही,
ऐ री हाँ बधाई बाज रही,
चलो रे चलो रे भानु के द्वार,
बधाई बाज रही ॥

भजन अज्ञात 16/09/2023

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मैं जोगी जस गाया, बाला मैं जोगी जस गाया 
धन्य है कीरत तेरे तन को, जिन ऐसी कन्या जाई ।।
गुनन बडी छोटी जिन जानो, अलख नारी घर आई ।।
जाको ध्यान धरत है मुनिजन, निगम खोज नहीं पाया॥
जो भावै सो लीजिए रावल, कारो अपनी दाया॥
देहो आशीष मेरी लाली को, बाढ़े अविचल काया॥
ना लेंहो मैं पाट पटम्बर, ना लेंहो कंचन माया॥
अपनी लली को दरस करा दें, जो मोहें गुरू ने बताया॥
विनती किये कहत रानी कीरत, सुन जोगिन के राया॥
मुख देखन नहीं देहो दिगम्बर, लाली जाय डराया॥
जाकी दृष्टि सकल जग ऊपर, सो क्यों जाय डराया॥
अलख लली है मेरी स्वामिनी, सो तेने भवन छिपाया॥
अलख लली को लाई कीरत, कर अंचल की छाया॥
दर्शन पाय चरण रज भेटी, श्रृंगी नाद बजाया।।
निरख निरख मुख पंकज लोचन, नयनन नीर बहाया॥
ठाकुरदास लडैती की लीला, महादेव को लाया।।
लीला लली ललित गुण अच्क्यो, चित नही चलत चलाया।।

पद अज्ञात 18/09/2023

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