रचनाकार/कवि/भक्त: अग्रअली ( रसिक संप्रदाय )
 

‘रसिक संप्रदाय’ के प्रवर्तक स्वामी अग्रदास ‘भक्तमाल’ के प्रसिद्ध लेखक नाभादास के गुरु थे। प्रियादास ने आमेर के राजा मानसिंह का इनकी सेवा में उपस्थित होना कहा है। मानसिंह अकबर के समकालीन एवं उसके प्रिय दरबारी थे। अतः अग्रदास का समय सन् 1553 ई० तथा उसके कुछ आगे तक माना जा सकता है। नाभादास ने ‘भक्तमाल’ में इनकी प्रशंसा में एक छप्पय लिखा है, जिसमें इन्होंने बताया है कि अग्रदास सदाचारनिरत भगवत् सेवानुरागी थे, इन्होंने एक पुष्पवाटिका लगायी थी और इससे ये बड़ा अनुराग रखते थे... अपने हाथों ही उसकी देख-रेख करते थे; ये नित्य रामनाम जपा करते थे। ये ‘पयहारी कृष्णदास’ के शिष्य तथा राम के अनन्य भक्त थे। प्रियादास ने इस छप्पय की टीका करते हुए लिखा है कि जब मानसिंह इनसे मिलने गये, तो उन्होंने अपने आने की सूचना देने के लिए नाभादास को स्वामी अग्रदास के पास भेजा। नाभादास ने इन्हें एक वृक्ष के नीचे ध्यानस्थ पाया और वे स्वयं भाव-विह्वल होकर वहीं जड़ हो गये। विलंब देख मानसिंह स्वयं बाग में गए और गुरु-शिष्य दोनों की यह स्थिति देखकर आश्चर्यचकित हो गए।

‘रसिक प्रकाश भक्तमाल’ में जीवाराम ने इन्हें रसिकों का संगम तथा ‘रसिक भाव’ की भक्ति का प्रचारक कहा है। उनके अनुसार इनकी रचनाओं में वाल्मीकि जैसी मधुरता थी। रैवासा (राजस्थान) में इन्होंने जानकीवल्लभ की रहस्योपासना की थी, इनको लोग ‘जनकलली की अग्रसहचरी’ कहा करते थे। प्रिय से मिलने हेतु ही इन्होंने एक पुष्पवाटिका लगायी थी। इन्हें ‘चंद्रकला सखी’ का अवतार भी कहा जाता है। इन्होंने यथेच्छ ध्यान-रस का पान किया था। ‘भक्तमाल’ के टीकाकार श्री वासुदेवदास के अनुसार ये शील के आचार्य थे। ज्ञान को मिटाकर ‘माधुर्यभाव’ इन्हीं का चलाया हुआ है, ये बारहों महीने रास किया करते थे। भक्ति, रसिकता, दंपत्ति-विलास और रामसागर की ये नौका थे। इन्होंने कील्हदास की आज्ञा से ही ‘रेवासा’ को अपना केंद्र बनाया था। यहीं इन्होंने ‘लली लाल’ का मंदिर बनवाया और अनेक कुंजों की रचना की। अनेक पाकशालाएँ भी इन्होंने बनवायीं। रास के लिए अनेक नाटक-मंडलियों की इन्होंने स्थापना की।

अग्रदास के प्रमुख शिष्यों में जंगी, प्रयागदास, पूरनदास, बनवारीदास, नरसिंहदास, भगवानदास, दिवाकर, जगतदास, जगन्नाथदास, खेमदास खींची, धर्मदास आदि का नाम लिया जाता है। नाभादास तो इनके प्रिय शिष्य थे ही। अग्रदास की गुरु परंपरा यों हैं: रामानंद, अनंतानंद, कृष्णदास पयहारी और अग्रदास। रसिक संप्रदाय में इन्हें ‘अग्रअली’ के नाम से भी जाना जाता है इनके प्रमुख ग्रंथ हैं- ‘ध्यानमंजरी या राम ध्यानमंजरी’‘कुंडलियाँ या हितोपदेश उपषाखाँ बावनी’‘शृंगार रससागर’, और (संस्कृत में) ‘अष्टयाम’। इनमें ‘ध्यानमंजरी’ का प्रकाशन सन् 1922 में वेंकटेश्वर प्रेस बंबई तथा सन् 1940 में मणिरामजी की छावनी अयोध्या से हुआ। ‘अग्र ग्रंथावली’ प्रथम खंड में कुंडलियाँ का प्रकाशन महात्मा राजकिशोरी शरण ने अयोध्या से सन् 1935 ई. में किया। ‘अष्टयाम’ का प्रकाशन रामकृष्णदास उत्श्रसवी ने अयोध्या से 1936 ई. में किया। ‘शृंगार रससागर’ अप्रकाशित एवं अप्राप्य ग्रंथ है। ‘अष्टयाम’ में राम की अष्टयाम उपासना का विस्तृत वर्णन है। ‘कुंडलियाँ’ में नीति और उपदेश से संबंधित छंद हैं। ‘ध्यानमंजरी’ में राम के ध्यान का वर्णन है। अग्रदास का विशेष महत्त्व रामभक्ति में माधुर्य भाव के प्रवर्तक के रूप में है। नाभादास इन्हीं के शिष्य थे, जिन्होंने मध्ययुग के भक्तों की प्रमुख विशेषताओं पर बड़े प्रामाणिक ढंग से लिखा है। सांप्रदायिक दृष्टि से अग्रदास द्वारा स्थापित पीठ वैष्णवों की अनेक शाखाओं का मूल स्थान मानी जाती है। आगे जाकर अकेले रैवासा से 11 गद्दियाँ स्थापित हुईं।

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