भोर निकुंजनि-आँगन-बीच लसैं बिलसैं हुलसैं पिय-गोरी |
आनन राजत पाननि-रंजित पाननि-कुञ्ज-छुबैं कुच-कोरी ||
बंक निहोरत भौंह मरोरत नैननि-बैंननि माँझ ठगोरी | 
श्री मुख श्री हरिवंश भनी नित सो हित रूप सनी यह जोरी ||