देखौ माई सुंदरता की सीवाँ |
व्रज नव तरुनि कदंब नागरी, निरखि करतिं अधग्रिवाँ ||
जो कोउ कोटि कोटि कलप लगि जीवै रसना कोटिक पावै |
तऊ रुचिर वदनारबिंद की सोभा कहत न आवै ||
देव लोक भूलोक रसातल सुनि कवि कुल मति डरिये |
सहज माधुरी अंग अंग की कहि कासौं पटतरिये ||
(जै श्री) हित हरिवंश प्रताप रूप गुन वय बल स्याम उजागर |
जाकी भ्रू विलास बस पसुरिव दिन विथकित रस सागर ||52||