खिरक बिच क्यों ठाड़ी राधा प्यारी ।
माथे हाथ दिए मन सोचत, कहाँ लगी तेरे प्यारी ॥
देखेंगे सो कहा कहेंगे, सुन वृषभान कुमारी ।
अब ही लाल गये गोअन में, आवन की है तैयारी ॥
बंसी बाज रही मोहन की, मोहि लई बृजनारी ।
“चन्द्रसखी“ भज बालकृष्ण छबि, तन मन घन बलिहारी ॥